लघुकथा:किस ऑफ डेथ
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©®Pawan Kumar/Written on 16th November 2017.
चित्र साभार-गूगल
दूर दूर तक कोई मंगरु के सानी का सपेरा नहीं था।जानलेवा ज़हर से भरा करैत हो या फन फैलाए काटने को आतुर 9-9 फ़ीट लम्बा कोबरा,मंगरु ने न जाने कितने विषैले साँपों को अपने वश में किया था।गांव में कहीं भी सांप विचरता दिखता,लोग फौरन मंगरु को याद करते और मंगरु अपनी विनम्र मुस्कान और गज़ब के जीवट के साथ सांप को पकड़ने फ़ौरन हाज़िर हो जाता।मंगरु की एक और खासियत थी,वह भयानक नागों को जाने कैसे चूम भी लेता था।लोगों के बीच उसका यह करतब इतना लोकप्रिय था कि लोग उसके इस तमाशा को देखने दूर दूर से आते थे।एक जब्बर और माहिर सपेरे के रूप में उसकी कीर्ति कोसों दूर तक फैल गई थी।अपने जोख़िम भरे कारनामें को अंजाम देते वक़्त मंगरु कई बार सर्पदंश का शिकार बन चुका था।दो बार तो उसकी जान जाते जाते भी बची थी पर बावजूद इसके उसने साँपों से खेलना नहीं छोड़ा था।मंगरु की बीबी बुचिया ने मंगरु से उनके दूधमुँहे बच्चे का हवाला दे देकर उससे ख़ूब मिन्नतें की कि वह उस बच्चे की ख़ातिर वह जानलेवा धंधा छोड़ दे।मंगरु अपनी बीबी बुचिया से बहुत प्यार करता था और बच्चे के प्रति उसके प्यार का कहना हीं क्या! सूद हमेंशा मूल से ज़्यादा प्यारा होता है।पर मंगरु धंधे से मिलने वाले नाम और दाम के फेरे में ऐसा फंस गया था कि चाहकर भी उस ख़तरनाक धंधे से किनारा नहीं कर पा रहा था।पर उस रोज़ अपने जन्मदिन वाले दिन बुचिया ज़िद पर अड़ गई और मंगरु से कहने लगी-'आज सांप का तुमरा आखिरी खेला होगा |आज लौटते बखत तुम इ सांप जंगल में छोड़कर हमरे लिए बेली का गजरा लेकर आओगे और गजरा इ सांप का पिटारा में रखोगे | हम आँख बंद कर इ पिटारा में हाथ डालेंगे |अगर गजरा हुआ तो हम ख़ुशी ख़ुशी पहन लेंगे और अगर सांप हुआ तो हमको काट खायेगा और फिर इ जन्मदिन हीं हमरा मरणदिन बन जाएगा|'
न अपने जन्मदिन पर संतोषी बुचिया ने इससे पहले कभी कुछ मांगा था और न हीं अभावग्रस्त मंगरु ने बुचिया को उसके जन्मदिन पर इससे पहले कभी कुछ दिया था।यह पहला मौका था जब बुचिया ने कुछ मांगा था, वह भी इतना आग्रहपूर्वक।
मंगरू इस बार तय कर गया कि वह धंधे से लौटते वक़्त सांप को जंगल में छोड़ देगा और सांप के करतब को हमेंशा के लिए अलविदा कह देगा पर लौटते वक़्त मंगरु के यार दोस्तों ने उससे पीने,पिलाने की चिरौरी क्या कर दी,वह उनके साथ देसी ठर्रा पीने बैठ गया ।पीने से फ़ारिग होने के बाद वह घर की ओर चल पड़ा।रास्ते मे जंगल आया पर मंगरु पर देसी ठर्रे का तास्सुर ऐसा चढ़ा था कि वह बुचिया से किया अपना वायदा भूल गया और सांप सहित सांप का पिटारा घर ले आया।मंगरु जब आंगन के चापाकल तक मुँह धोने गया था,बुचिया आंखें बंद कर बड़ी प्रसन्नहृदय सांप के पिटारे में हाथ डाल बैठी इस आश्वस्तता में कि मंगरु वादे के मुताबिक़ ज़रूर सांप को जंगल मे छोड़ पिटारे में उसके लिये बेली का गजरा लाया होगा।एक प्राणघातक फुफकार के साथ सांप ने अपना काम कर दिया।कुछ हीं देर में बुचिया के प्राण पखेरू उड़ गए।मंगरु कई दिनों तक बुचिया के दुःख में बेसुध रहा।इस आड़े वक़्त में पास पड़ोसियों ने उसे और उसकी प्यारी बुचिया की इकलौती प्रेम-निशानी,उसके बच्चे को सम्हाला।वक़्त ने जब ज़ख्म भरे और मंगरु को थोड़ी सुध-बुध आई तो उसने सांप के करतब को सदा के लिये राम राम कह अपना जीवन अपने अबोध बच्चे की देख-रेख में समर्पित कर दिया।
मंगरु ज़रूर चुप बैठ गया था पर उसकी ख्याति चुप नहीं बैठी थी।उस दिन भी मंगरु की ख्याति सुनकर उसके मृत्यु को चुनौती देने वाले करतब को कैमरे में क़ैद करने की मंशा लिए सपेरों के जीवन पर डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बना रहे एक नामी प्रोडक्शन हाउस से कुछ लोग आए और उन्होंने मंगरु को नाम,दाम क्या क्या का प्रलोभन न दिया पर मंगरु साँपों से दूर रहने के अपने निर्णय पर अडिग रहा।उस दिन तो प्रोडक्शन हाउस वाले चले गए पर उन्होंने हार नहीं मानी।कुछ हीं दिनोपरांत उन्होंने अपनी सबसे काबिल,मृदुभाषिणी और रूपवती क्रिएटिव डायरेक्टर वैदेही अंजुम को मंगरु के पास उसे तमाशे के लिए रज़ामंद करने भेजा ।
वैदेही रूप और बुद्धिमत्ता दोनों में बेजोड़ थी।उसने मंगरु से मिलने से पहले गांव वालों से मिलकर मंगरु की सारी कहानी जान ली।उसने जान लिया कि मंगरु की वह कौन सी रग थी जिसे दबाने से मंगरु हथियार डाल देता।
वैदेही मंगरु से मिली पर उसका पहला दांव असफ़ल रहा।उसने मनमोहक मुस्कान बिखेरते हुए बड़ी विन्रमता के साथ मंगरु से जब अपनी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म के लिए उसका मशहूर करतब दिखाने की गुज़ारिश की तो अपने बच्चे को खिलाने में मशगूल मंगरु कह बैठा-'नहीं नहीं बड़ा जानलेवा काम है,कहीं कुछ उन्नीस बीस हो गया तो मेरे बच्चे को कौन देखेगा?'
मंगरु ने वह तमाशा न करने की दिशा में बड़े से बड़े तर्क दिए।वैदेही उसे मनाने की भरसक कोशिश करती रही।मंगरु के हठ को वैदेही की लच्छेदार और दिलजोई बातों,उसकी जाज़िब अदा और रूपलावण्य का आंच धीरे धीरे पिघला तो रहा था पर बहुत धीरे और मामूली रूप से और इसलिये वैदेही ने मंगरु पर अपने तुणीर में बचा अपना अमोघ अस्त्र छोड़ दिया,यह कहकर-'अगर तुमसे बुचिया एक बार तमाशा दिखाने कहती तो क्या तुम उसको भी मना कर देते !मुझे बुचिया समझ कर मेरी बात मान लो|'
वैदेही की इस बात ने मंगरु की रगों में जम चुके जज़्बात को फ़िर से रवानगी दे दी।वह वैदेही की मांग के आगे नतमस्तक होते हुए अपना करतब दिखाने को राज़ी हो गया।
तयशुदा दिन मंगरु कैमरे के सामने एक भयानक नाग के साथ अपना विख्यात करतब दिखाने जा रहा था।अभ्यास की कमी के कारण इस कलाबाजी को दिखाते वक़्त मंगरु थोड़ा आंतरिक रूप से घबराया हुआ था पर उसने अपनी घबराहट पर काबू पाते हुए अंततः वह करतब सफलतापूर्वक दिखा हीं दिया।पर शायद उस दृश्य को फ़िल्माते वक़्त कोई तकनीकी कसर रह गई थी,उस डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म का डायरेक्टर मंगरु से फिर एक बार वह शॉट देने के लिए कहने लगा।मंगरु इस बार अड़ गया कि वह वो खतरनाक काम दुबारा नहीं करेगा।
'यु नो मंगरु जी आपने कमाल का काम किया है।बस मेरी ख़ातिर एक बार और कर लो प्लीज।' वैदेही ने जब इतने प्यार से ऐसा कहा तो मंगरु पेशोपेश में पड़ गया।मंगरु को असमंजस भरी चुप्पी में देख वैदेही ने अपना ज्यादा प्रभावी दांव खेला और मंगरु को ' यू आर सच अ डार्लिंग' कहते हुए चूम लिया।
मंगरु के मन के मरु-स्थल पर जाने कितनी मुद्दतों के बाद प्रेम-सुधा बरसी थी।इसके बाद मंगरु के पास ना कहने की कोई गुंजाइश नहीं बची थी।वह फिर 'एक्शन' कहे जाने के बाद फुफकारते भयानक काले नाग को चूमने का प्रयास करने लगा।उसने नाग को लगभग चूम हीं लिया था कि तभी कहीं से एक आवारा कुत्ता वहां आ धमका और नाग को देखकर जोर जोर से भौंकने लगा।कुत्ते की भौंक से मंगरु की क्षणभर के लिए एकाग्रता क्या भंग हुई,नाग ने उसे सिर पर डंस लिया।मंगरु को बचाने की बहुत क़वायद हुई पर चूंकि ज़हर का असर सिर पर सीधा हुआ था,मंगरु बच न सका।यह कहना मुश्किल था कि कौन सा चुम्बन उस सपेरे के लिए 'किस ऑफ डेथ' साबित हुआ,ज़हरीले कोबरा का चुम्बन या उस हसीन वैदेही का चुम्बन।
-पवन कुमार श्रीवास्तव की मौलिक रचना।

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